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revenue system in india || (ब्रिटिश कालीन कर व्यवस्था एवं राष्ट्रवाद )

भारत एक कृषि प्रधान देश है  | कृषि प्रारम्भ से ही भारत का प्रमुख व्यवसाय रहा है  | भारत की लगभग 80 % आबादी कृषि एवं कृषि सम्बन्धित उद्योगों पर निर्भर रही है | इसीलिए यह कहना गलत नही होगा कि भू राजस्व भारतीय प्रशासनीय आय का प्रमुख स्त्रोत रहा है | यही नही भू राजस्व भारतीय प्रशासन का एक अभिन्न अंग भी रहा है | प्राचीन काल में खेतो  के निकट बसने वाले समूह को ने ग्रामों का रूप ले लिया | प्रारम्भिक समय में प्रत्येक व्यक्ति अपने रोजमरा की आवश्कताओ की पूर्ति  स्वयं किया करते थे | किन्तु कालांतर में गावो में सहकारी समूह  के  विकास  ने अनेक ग्रामीण  कृषको के अलावा उनके सहायक करने वाले व्यक्ति  (जैसे बुनकर ,खाती, चमार लोहार,कुम्हार ,तेली) समूह भी हुआ करते थे | 



प्राचीन काल में इस व्यवस्था से ग्रामीणों एवं कृषको की आर्थिक दशा पर विपरीत प्रभाव पड़ा | क्योकि सामंतवादी व्यवस्था , शासकवर्ग एवं भूराजस्व प्रणाली का निर्धारण तथा वसूली न्याय उचित था | प्राकृतिक प्रकोप के उपजी आकाल  की समस्या  से  किसानो को मुक्ति दिलाने के लिए  भूराजस्व से मुक्त का प्रावधान भी देखने को मिलता है | किन्तु जब ब्रिटिश भारत व्यापार करने के उद्देश्य से उन्होंने तकरीबन १०० वर्षो तक भारत में  व्यापार किए उसके पश्चात् उन्होंने भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करना शुरू किया |उन्होंने बंगाल , मद्रास ,बम्बई जैसे प्रान्तों पर विजय स्थापित की |जिसे ब्रिटिश अधिकृत क्षेत्र कहा जाता था | जहाँ उन्होंने प्रशासन के व्यवस्था को विस्तार देते हुए | आय के एक अन्य स्त्रोत की तलाश की | जिसे भू – राजस्व के रूप में हम जानते है | 

ब्रिटिश काल में अंग्रेजी हुकुमत के द्वारा कई भू राजस्व की नीति चलाई गई | जिसमे रैयतवानी , महालवाणी , स्थायाई बंदोबस्त प्रमुख रहे है | क्योकि अंग्रेजी हुकुमत को भू राजस्व का अच्छा ज्ञान प्राप्त नही था | यही वजह रहा की भू राजस्व की नीतियों की खामियों के परिणाम स्वरूप समाज में दो स्तरीय शोषण को बढ़ावा मिला एक तरफ इस व्यवस्था में किसानो की हालात पतली होती चली गई तो समाज के धनी , सम्पन्न वर्ग कहे जाने वाले जमीदार वर्ग का शोषण देखने को मिला |

इस दो स्तरीय शोषण के एक वर्ग और भी था जिसे समाज के साहूकार के रूप में जानते है जिसने मनमाना किसानो का शोषण किया |इस आता ताई (शोषण , अधीनता , दरिद्रता , भूमि हीनता ,  आकाल , अत्यधिक कर वसूली , ) व्यवस्था के परिणाम स्वरूप देश मध्य जगह जगह ( तेभागा , तेलगाना , संथाल प्रमुख रहे ) पर राष्ट्रवाद की पनिधि हुई | अंततः अंग्रेजी हुकुमत को अपने दोषपूर्ण नीति में सुधार करते रियायते देनी पड़ी , या तो बदलाव करने पड़े अथवा समाप्त कर देना  पड़ा |      

भारत एक कृषि प्रधान देश है  | कृषि प्रारम्भ से ही भारत का प्रमुख व्यवसाय रहा है  | भारत की लगभग 80 % आबादी कृषि एवं कृषि सम्बन्धित उद्योगों पर निर्भर रही है | इसीलिए यह कहना गलत नही होगा कि भू राजस्व भारतीय प्रशासनीय आय का प्रमुख स्त्रोत रहा है | यही नही भू राजस्व भारतीय प्रशासन का एक अभिन्न अंग भी रहा है | प्रसिद्द विद्वान रोमेश दत्त के शब्दों में “ समस्त  सरकारों की प्रशासनिक सरचना भू  राजस्व  के निर्धारण एवं उसकी वसूली की प्रक्रिया से अभिन्तं सम्बन्धित रही है इसलिए इस देश के प्रशासनिक तथा भूराजस्व  या वित्तीय इतिहास के निर्माण में भूराजस्व प्रणाली तथा इसके क्रियान्वयन का सर्वोपरि महत्व रहा है |इसके अतिरिक्त अवधि में (19वी. शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ) कृषि भारत में सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक प्रवृतिय बनी रही है |तथा कृषि और कृषक के भाग्य का आधार भूराजस्व की मात्रा तथा इसका निर्धारण एवं वसूली रहा है |”

भारत में कृषि तथा कृषक की आर्थिक दशा के आधार पर ही  प्रशासन की  कुशलता मानी जाती रही है | और इस दशा का आधार उचित मात्रा भूराजस्व प्रणाली को लगाया जाना रहा है | जो  प्रशासन के उदार  तथा लोक कल्याणकारी के चरित्र को प्रदर्शित करता रहा है | जब भूराजस्व की मात्रा में अत्यधिक कर की वृद्धि एवं  वसूली में कठोरता की  नीति प्रशासन की क्रूरता  एवं  अत्याचार का पर्याय माना जाता रहा है |  इसलिए  न्याय पर आधारित उचित  भूराजस्व प्रणाली का निर्धारण एव वसूली में उदारता को होना   अत्यधिक आवश्यक  है | कठोरता  एव क्रूरता  के आधार पर भूराजस्व की गई  वसूली कृषको  की दयनीय दशा के कारण हमेशा से बनते रहे  है | जिसके परिदृश्य  ब्रिटिश कालीन कर व्यवस्था में देखने को मिलते   रहे है | जिसका परिणाम यह देखने को मिला की  ब्रिटिश काल में कृषको की दशा दयनीय होती चली गई | ऐसा नही की भारत में ब्रिटिश कालीन भू – राजस्व व्यवस्था के पूर्व  भू – राज्य से सम्बन्धित प्रणाली विदमान नही थी |भारत में कई प्रकार की कर प्रणाली प्रचलित थी | 

भू राजस्व व्यवस्था के स्वरूप -  

एक ऐसी भूमि व्यवस्था थी जिसमें सीधे बंदोबस्त किया गया इस प्रणाली में जमीदार नंबरदार या तालुके दा जैसा कोई भी बिचोलिया नहीं था जो किसान और सरकार के बीच मध्यस्थता करता रहता और सरकार के बीच सीधा संपर्क संबंध था रैयत को भूमि का स्वामी माना गया तथा उनका अधिकार अनुवांशिक बनाया जा रही हो अपनी भूमि को बेचने या गिरवी रखने का अधिकार दिया जाए इस व्यवस्था के साथ बंदोबस्त कोई स्थाई स्थाई नहीं बनाया गया तथा इसे इसी रूप नियमित रूप से 20 से 30 वर्ष के बाद संशोधित किया गया जाता था और आमतौर से राजस्व की मांग को बढ़ा दिया जाता था प्रत्येक गांव की भूमि का सर्वेक्षण हुआ और भूमि संबंधी दस्तावेज तैयार हुए दिन जिसमें प्रत्येक रैयत की भूमि का विवरण अंकित है इस अभिलेख में रजत का नाम पता उगाई गई फसलों का विवरण प्रति वर्ष के लिए लिखा जाता था सर्वेक्षण के समय भूमि की उत्पादकता के फसलों की दृष्टि में रखा गया था कुछ वर्षों की पैदावार को दृष्टि में रखते हुए 1 वर्ष का औसत निकाला गया और इस उत्पादन का 45% भाग भू राजस्व के रूप में लेने की बात तय की गई और उपज को नगद राशि में बदलने के लिए स्थानीय बाजार भाव को दृष्टि में रखा गया अनेक वर्षों के अध्ययन और विचार विमर्श के बाद लागू की गई थी इसके द्वारा यह कहा गया कि महालत वा गांव की समस्त भूमि का बंदोबस्त किया जाएगा और सामान्य एक ही व्यक्ति के नाम से उस गांव की भूमि व्यवस्था लागू होगी जिसके साथ ही भागीदारों के हितों की भी रक्षा की गई जिसके साथ अलग से बंद बस की नहीं किया गया यद्यपि भू राजस्व की अदायगी के लिए सदा मालगुजार की जिम्मेदार था किंतु सा भागीदार यदि आवश्यक समझे तो अपने हिस्सों को अलग कर आ सकता था सदर मालगुजार के संदर्भ में निर्णय लिया लिया करता था जिला कलेक्टर की उपस्थिति में ग्राम समुदाय द्वारा किया जाने की व्यवस्था थी |
1.1 भारत मे ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार से पूर्व की भू राजस्व व्यवस्था  :

कृषि भारत का प्रारम्भ से ही मुख्य व्यवसाय रहा है | प्राचीन काल में खेतो  के निकट बसने वाले समूह को ने ग्रामों का रूप ले लिया | प्रारम्भिक समय में प्रत्येक व्यक्ति अपने रोजमरा की आवश्कताओ की पूर्ति  स्वयं किया करते थे | किन्तु कालांतर में गावो में सहकारी समूह  के  विकास  ने अनेक ग्रामीण  कृषको के अलावा उनके सहायक करने वाले व्यक्ति  (जैसे बुनकर ,खाती, चमार लोहार,कुम्हार ,तेली) समूह भी हुआ करते थे | प्राचीन काल में इस व्यवस्था से ग्रामीणों एवं कृषको की आर्थिक दशा पर विपरीत प्रभाव पड़ा | क्योकि सामंतवादी व्यवस्था , शासकवर्ग एवं भूराजस्व प्रणाली का निर्धारण तथा वसूली न्याय उचित था | प्राकृतिक प्रकोप के उपजी आकाल  की समस्या  से  किसानो को मुक्ति दिलाने के लिए  भूराजस्व से मुक्त का प्रावधान भी देखने को मिलता है | 

अधिकांस भाग सिचाई परिवहन विकसित बीज  खाद आदि के स्थानों का विकाश करने हेतु खर्च  करने के लिए धन उपलब्ध करने के लिए प्रयत्न शील रहते थे प्राचीनकाल में भारतीय भू राजस्व प्रशासन कृषक  को तथा ग्राम समुदाई के लिए कल्याणकारी था जो तत्कालीन उदार प्रशासन का दोतक है | अंग्रेज भारत में व्यापारी बनकर अपने आर्थिक हितों की पूर्ति के  लिए आया | उन्होंने भारत का जमकर शोषण किया जिससे भारत निरंतर निर्धन होता गया उस समय भारत की परंपरागत आर्थिक व्यवस्था को नष्ट कर दिया के आगमन के समय कि भारत की आर्थिक दिशा के संबंध में चोपड़ा पूरी वह दास ने लिखा है कुल मिलाकर भारत की आर्थिक स्थिति अंग्रेजों के के भारत पर विजय प्राप्त करने के समय तक का संतुलित थी । यह संतुलन कृषि और उद्योग के बीच था भारत के आर्थिक ढांचे में में हुए परिवर्तन स्वभाविक नाथा अपितु थोपा गया था पंडित नेहरू के अनुसार भारत विश्व का बाजार का एक अंग नहीं बन सका पर वह अंग्रेजी ढांचे का एक उपनिवेश इक एवं सांस्कृतिक अंग बन गया |

1.2  ब्रिटिशकालीन राजव्यवस्था -

ब्रिटिशकालीन राजव्यवस्था के समय में अंग्रेजों हुकुमत के नुमाइन्दी को भू राजस्व प्रणाली के प्रबन्ध का को खास ज्ञान नही था | जिसके उदाहरण क्लाइव के भू राजस्व की नीति में देखने को मिलते है | क्लाइव के भू राजस्व को एकत्र करने की पुरानी नीति थी | जिसको उन्होंने आगे भी जारी रखा | जिसके लिए   बंगाल के डिप्टी दीवान को उत्तरदायि बनाया गया था | यही वजह है कि हेस्टिंग ने इस भू राजस्व की व्यवस्था की खामिया में विचार  करते हुए  | भू राजस्व के  वसूली  के अधिकार को  1772 में बंगाल समाप्त करते हुए , आपस ले लिया |

1.2.1  वारन हेस्टिंग की भू राजस्व नीति-

क्योकि बंगाल के दीवानी के उत्तरदायित्व का भार  अब कंपनी शासन पर आ गया | इसलिए वारन हेस्टिंग भू राजस्व को  नियमित करने के उद्देश्य से  पंचवर्षीय बंदोबस्त व्यवस्था को लागू किया |

1.2.1.1. पंचवर्षीय व्यवस्था-

इस पंचवर्षीय बंदोबस्त व्यवस्था की प्रमुख विशेषता यह थी कि इसमें  भूमि की बोली लगाई जाती थी | सबसे ऊंची बोली लगाने वाले व्यक्ति को  5 वर्ष के लिए भूमि ठेके दिया जाता था | साधारणत यह कार्य ग्राम के जमीदार वर्ग के द्वारा किया जाता क्योकि उनकी आर्थिक स्थिति समाज में काफी अच्छी थी यही वजह है कि जमीदारों को पंचवर्षीय बंदोबस्त व्यवस्था में प्राथमिकता मिलती थी | जमीदार द्वारा के भूमि को भूमिहीनों/कामगारों  को  पट्टा दिया जाता था | जिसमें तहत लगान की राशि पूर्व निर्धारित होती थी | लगान की राशि को जिले स्तर में कलेक्टर /दीवान की सहायता से वसूली जाता था | इस उद्देश्य के पूर्ति हेतु प्रत्येक जिले में दीवानी अदालतों की स्थापना की गई थी | इसके अलावा लगान व्यवस्था पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए दो राजस्व नियंत्रण परिषद की स्थापना हुई | भू राजस्व प्रशासन पर नियंत्रण रखने वाली  गवर्नर व उसकी परिषद  को  राजस्व मंडल कहा जाता था | गवर्नर की सहायता के लिए राय नारायण नामक भारतीय अधिकारी नियुक्त किये जाते थे |

समीक्षा-

पंचवर्षीय बंदोबस्त की व्यवस्था के अंतगर्त दो स्तर शोषण देखने को मिलता है | प्रथम जमीदार वर्ग के लोग भुमि की ऊंची बोली लगाकर भूमि का ठेका तो ले लेते थे किन्तु  भुमि का लगान जमा नहीं कर पाते थे | जिसके परिणाम स्वरूप बहुत धनराशी बाकि रह जाती थी | दुसरे लगान की राशि वसूलने  हेतु किसानों का अत्यधिक शोषण किया जाता था | जिसके किसानो की दशा और भी दयनीय होती चली गई | इस प्रकार पंचवर्षीय बंदोबस्त की व्यवस्था किसानों तथा कंपनी दोनों के लिए अत्यधिक हानिकारक साबित हुई | वारन हेस्टिंग ने पूर्ववर्ती व्यवस्था को समाप्त कर  पंचवर्षीय व्यवस्था लागू की किंतु किसानों एवं जमीदारों की गिरती दशा के कारण यह योजना भी विफल साबित हुई |जिसका कारण लगान की अत्यधिक वसूली , जिसने  कृषको  की दशा अत्यधिक दयनीय बना दिया | जिससे सरकार और खेती करने वालों कृषक के आपसी  संबंध दरार आ गई  और जमीदारों तथा काश्तकारों के बीच के संबंध पूरी तरह खत्म हो गए | कहने का तात्पर्य यह है कि बंगाल में राजस्व प्रणाली का गलत तरीको से क्रियांवयन किया गया | प्राचीन भूस्वामी परिवारों को नष्ट किया गया तथा कृषि को पर गंभीर अत्याचार किए गए | जिसके परिणाम स्वरूप   किसानों के पास तन ढकने के लिए कपड़ा के भी मौताज हो गए | इसलिए खेती छोड़ कर चले गए | जिससे खेती करने वाले कमी एवं अकाल पड गया | जिसकी वजह से भारत में कंपनी के अधिकृत क्षेत्र के एक तिहाई भाग को जंगली जानवर संरक्षित कर  दिया गया |


वारन हेस्टिंग द्वारा स्थापित यह व्यवस्था ना तो किसानों का हित कर सकी  और न ही कंपनी का | इस व्यवस्था के अंतर्गत जमीदारों ने ऊंची बोली लगाकर भूमि तो प्राप्त कर तो लिया  | लेकिन उतना अधिक लगान वसूल कर कंपनी के कोष में जमा नहीं किया जा सका |  काफी समय के प्रयास के बावजूद  भी कंपनी का 25 लाख रुपया जमीदारों में बाकी रह गया | अतः वारन हेस्टिंग ने पंचवर्षीय व्यवस्था को समाप्त कर 1 वर्षीय योजना लागू किया गया | लेकिन यह योजना भी अधिक लाभदायक सिद्ध हो सके क्योंकि इससे किसानों और जमीदारों दोनों की स्थिति बिगड़ती जा रही थी | कार्नवालिस की नियुक्ति के समय इस व्यवस्था के गंभीर दोष आ  चुके थे | कि जब कार्नवालिस का  भारत में  आना हुआ | कार्नवालिस के  भारत आगमन के उपरांत कही गई इस बात से यह भलि भाँती स्पष्ट है कि जब वह भारत पहुंचा उसने उसने कृषि व व्यापार को घिरते देखा , उस समय खेती और और जमीदार निर्धनता के गर्त में डूबे जा रहे थे और महाजन ही समाज के सबसे अधिक संपन्न अंगद थे | क्योकि सत्र में पारित हो चुका था इस एक्ट के अनुसार संचालन मंडल को वार्षिक प्रणाली के स्थान पर भूमि का स्थाई बंदोबस्त करने को कहा गया भू राजस्व  मिला दो के पक्ष की सहानुभूति व्यक्त की गई | 2 वर्ष उपरांत अर्थात 1786 इसी में संचालन मंडल ने कार्यभार इसको भूमि का स्थाई प्रबंध करने का आदेश दिया था | कार्नवालिस ने संचालन मंडल के  आदेशअनुसार स्थाई बंदोबस्त की व्यवस्था हेतु कार्य आरंभ कर दिया इस कार्य में उसे राजस्व मंडल का अध्यक्ष जॉन सोर तथा बंगाल सरकार के मुख्य उच्च अधिकारी का सहयोग प्राप्त हुआ जेम्स ग्रांट राजस्व संबंधित मामलों का सैद्धांतिक ज्ञाता थे |  जान शोर  को भूमि करो के संबंध में जानकारी थी काफी समय तक इस प्रश्न पर विचार होता रहा कि समझौता किस से किया जाए जमीदार से या किसानों के साथ आखिर कारण कार्नवालिस की इच्छा अनुसार जमीदारों के साथ 1790 ईस्वी में 10 वर्षीयसमझौता कर लिया गया तथा अपनी घोषणा में कहा गया कि इस व्यवस्था को स्थाई भी किया जा सकता है संचालन ओ ने भी इस 10 वर्षीय समझौते का अनुमोदन करते हुए कहा था की यदि यह व्यवस्था सफल रही तो स्थाई कर दिया जाएगा 3 वर्ष बाद बोर्ड आफ कंट्रोल के अध्यक्ष  द ढूंढ दास ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री पीठ से कार्नवालिस की इस व्यवस्था को स्थाई करवा दिया तदनुसार 22 मार्च 1793 को कार्नवालिस स्थाई बंदोबस्त अथवा इस्तमरारी बंदोबस्त परमानेंट सेटेलमेंट को स्थाई रूप से लागू कर दिया।   इस व्यवस्था के अंतर्गत सरकार ने जमीदारों से लगान वसूली की राशि निश्चित कर  1765 की दर से तीगुनी कर दी |  इसका स्पष्टीकरण देते हुए कहां गया था की स्थाई प्रबंध के बाद यदि उत्पादन बढ़ता है  , तो भी राज्य को इस दर में वृद्धि करने का अधिकार नहीं होगा | न्यायालय से सुख प्राप्त किए लगान की दर में वृद्धि नहीं की जा सकती |  

8.       किसान राजस्व और जमीदारों के पारस्परिक संबंध के विषय में जमीदार को स्वतंत्र कर दिया गया | इसके साथ ही जमीदारों को अपने किसानों के लिए पट्टे जारी करने का आदेश दिया किसानों को , जो कल अपने जमीदार को देना था | उसका उल्लेख पट्टे पर होता था | इसके अतिरिक्त किसानों और जमीदारों के पारस्परिक संबंध का भी उल्लेख होता किया गया |  यदि कोई  जमीदार अपने किसानों को दिए गए पट्टे वह उल्लंघन करेगा , तो किसान को उसके विरूद्ध न्यायालय में जाने का पूर्ण अधिकार होगा |

मद्रास में रैयतवाड़ी व्यवस्था –

असद ओवैसी में कैप्टन रीड द्वारा , थॉमस मुनरो के द्वारा मद्रास में लगान का  अनुपात 1 / 2 भाग लाख निर्धारित किया गया | इसे अन्य भाग में भी लागू किया गया | 1820 में टॉमस मुनरो के  मद्रास का गवर्नर बनने के पश्चात लगान की राशि को घटाकर उपज का 1/ 3 भाग निर्धारित कर दिया | यह राशि भी बहुत अधिक थी | तथा किसानों पर बहुत बोझ पड़ता था | क्योकि  भूमि का लगान  नगद चुकाना पड़ता था मुनरो तथा कैप्टन रीड की व्यवस्था 30 वर्ष तक प्रचलित रही | कर बहुत कठोरता पूर्वक वसूल किया जाता था |

रैयतवाड़ी व्यवस्था के दोष -

इस व्यवस्था के दोष निम्नलिखित थे | लगान वसूली में सरकार कर्मचारी पक्षपात करते थे | एवं किसानों का शोषण करते थे | किसानी करने को ही भूमि के स्वामी थे | व राजस्व अधिकारी निरंकुशता व कठोरता का व्यवहार करते थे | एवं किसान द्वारा लगाना न चुकाए जाने पर , उन्हें तुरंत बेदखल कर दिया जाता था|  किसानों का फसल बिगड़ने के समय महाजनों से दिन लेकर लगा चुकाना पड़ता था | अतः महाजनों के शोषण चक्कर में फस गए | इस व्यवस्था से मुंबई प्रेसिडेंसी में नवीन वर्ग का उदय हुआ | जिसमें मारवाड़ी महाजन शामिल थी | किसानों को उचित ब्याज दर पर ऋण देते थे | इस न्याय व्यवस्था द्वारा इस वर्ग को संरक्षण दिया गया | सरकार को छोटे-छोटे किसानों से लगान वसूल करने में अधिक धन खर्च करना पड़ता था | व्यवस्था का प्रभाव यह हुआ कि व्यवस्था भी किसानों के लिए हानिकारक सिद्ध हुई |  सरकार नए तरीके के अधिकारी लगान वसूल करने का कार्य करती थे |  स्वामी होते हुए भी किसानों की स्थिति अधिक अच्छी नही थी | इसका एक कारण यह भी था कि  किसानों को  कृषि सुधार का तरीका नही ज्ञात था |  किसानों को प्राकृतिक आपदाओं के समय भी लगाना पड़ता था | किसानों को उचित दरों पर साहूकारों धन  लेना पड़ता था | यह लोग किसान के अनपढ़ होने का लाभ उठाकर उसे धोखे से  उनकी जमीन मकान , आधी संपत्ति हड़प लेते थे | सरकारी कानून साहूकारों के पक्ष में ग्राम पंचायतों को किसानों की साहूकार के शोषण से रक्षा करने के अधिकार से वंचित कर दिया गया | जिसके परिणाम स्वरूप  भूमि को साहूकारों एवं जमीदारों ने हड़प लिया |  तथा किसान भूमिहीन हो गए | इसका पता इस बात से चलता है कि 1948 में 60% प्रतिशत मजदूर भूमिहीन थे | महालवाड़ी बंदोबस्त इस व्यवस्था में लगान का समझौता | गांव के समस्त जमीदारों के साथ साथ , सम्मिलित रूप से किया जाता था एवं लगान  चुकाने का उत्तर दायित्व उन पर संयुक्त रूप डाल दिया गया |

1.2.4. महालवाड़ी बंदोबस्त के दोष  -

महालवाड़ी बंदोबस्त के दोष  किस प्रकार के थे | इस प्रणाली में स्थाई बंदोबस्त के सभी दोष विदमान थे |  यह प्रणाली स्थाई बंदोबस्त का ही परिवर्तित रूप था | सरकार तथा किसानों के मध्य प्रदेश संपर्क स्थापित करने का को जन माध्यम नही था | सरकार को किसानों की समस्याओं की जानकारी नहीं मिल पाती थी | इस व्यवस्था में साहूकार , जमीदारों की भांति ही किसानों का शोषण करते थे |  इससे किसानों को कोई लाभ नही मिल पाता था | महालवाड़ी की व्यवस्था में  इस वर्ग ने जमीदारों की भांति किसानों का शोषण किया है|  इसमें लगान की दर बहुत अधिक थी | आरंभ में यह कुल उपज का 2 / 3 भाग था , जो बाद में हटा कर  १/२  कर दिया गया | करो के बहुत भारी बोझ से किसानों की दशा बिगड़ दी |  निष्कर्ष कंपनी द्वारा लागू की गई | इन तीनों ही भू राजस्व नीतियों में लगान की दर बहुत अधिक होने के कारण किसानों की दशा बिगड़ गई | अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई | इस  पद्धति  अंग्रेजों की  आर्थिक प्रयोग प की दृष्टि से लागू की थी | अतः वे असफल रहे  तथा भारतीय कृषि को धक्का पहुंचा | इस प्रयोग से देश में सामाजिक तनाव बढ़ा तथा अराजकता  उत्पन्न हुई | जमीदार को पुनर्जीवित जीवन प्राप्त हुआ तथा मानव सहकारी   अकाली श्रृंखला प्रारंभ हुई|  इनसे गांव में छोटे-छोटे किसानों एवं खेती करने लगे जिससे  कास्ट कारों की संख्या बढ़ती एवम भारतीय ग्रामीण व्यवस्था छीन बिन हो गई|  सदभावना ने  प्रति बंधुओं में बढ़ोत्तरी हुई |  धनी वर्ग जो लाभ हेतु लग रहा था किसानों के हितों से कोई लेना देना ना था |उन्होंने किसानों का जमकर शोषण किया | जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था का ढांचा चरमरा ने लगा |


दत्ता एवं सुंदर में लिखा है -

“ जमींदारी प्रथा और स्थाई बंदोबस्त की  प्रथा के साथ-साथ प्रचलन के कारण , उसकी विशेषता एक दूसरे में मिल गई | किंतु तीनो प्रणालियों का झुकाव जमींदारी प्रथा की  प्रवित्तियों की ओर रहा थी |”

श्री रमेश दस्त ने लिखा है -

“ भू राजस्व में  अगर कोई जमीदार किसानों के अधिकारों पर अतिक्रमण अतिक्रमण करता था तो किसानों को उसके विरोध न्यायालय में जाने का अधिकार नही  था |इस व्यवस्था से जमीदारों को भी लाभ पहुंचा | भूमि पर जमीदारों का स्थाई रूप से अधिकार कर लिया गया था | इससे उन्हें अपनी भूमि से पीढ़ी दर पीढ़ी लाभ प्राप्त होता रहा | इससे ज्यादातर  जमीदार अमीर हो गए ,  उन्होंने उद्योग तथा व्यापार में ध्यान लगाना शुरू किया | इधर भूमि की कीमत से निरंतर वृद्धि होने लगी | लेकिन लगान की राशि में कोई अंतर नही देखा | परिणाम स्वरूप जमीदार वर्ग  समाज का अर्थ संपन्न वर्ग बन गया | अब इस वर्ग के लोग आराम पूर्वक जीवन जीने लगे | ”

स्थाई बंदोबस्त से बंगाल की संपदा में वृद्धि हुई और कृषि की दशा भी पर्याप्त सुधरा हुआ | जब जमीदारों के पास धन संचय होने लगा , तो उन्होंने इस धन का उपयोग उद्योग धंधों के  निरंतर विकास होने लगाना शुरू किया | और आकाल  के प्रकोप से भी बंगाल को राहत मिली | परिणाम स्वरुप बंगाल ब्रिटिश सबसे संपन्न प्रांत बन गया |

डॉक्टर दत्त ने की थी लिखा है कि -

“स्थाई भूमि व्यवस्था भारत में अंग्रेजों के शताब्दी के शासन का एक ऐसा शेर है जिसके कारण यहां के निवासियों के हित की अधिकता होने लगे | इस प्रकार बंगाल की जनता ने साहित्य एवं कला में रुचि लेना आरंभ कर दिया | इस बंगाल में शिक्षा और संस्कृति के संस्कृति के प्रचार-प्रसार का  मार्ग प्रशस्त हो गया । ”

 स्थाई बंदोबस्त के  दोष -

स्थाई भूमि बंदोबस्त में यद्यपि अनेक गुण विदमान थे | तथापि व्यवस्था पूर्णता निर्दोष नहीं थी | इसीलिए कुछ विद्वानों ने इसे अत्यंत दूषित प्रणाली बताते हुए | इसकी जमकर आलोचना की है |

 

1.2.5  ब्रिटिश भू राजव्यवस्था की पाणीधि बनी राष्ट्रवाद का जड़  - 

पीआर होम्स ने इसकी आलोचना करते हुए दिखा है कि “स्थाई बंदोबस्त 181 भयंकर भूल थी | छोटे किसानों को इससे कोई लाभ नहीं हुआ | जमीदार भी बार-बार लगा चुकाने में असफल रहे हैं | लगान की दर को सरकार के लाभ के लिए भेजते ”

भारतीय रियासतों में  किसानों का विद्रोह का करण यह था कि भारतीय रियासतों में किसानों की हालत ब्रिटिश इंडिया से भी अधिक खराब थी | उनको कई प्रकार के नाजायज कर और उपकर देने पड़ते थे |किसानों ने उनके खिलाफ प्रोसेस टेस्ट किये  | खेती  छोड़कर जंगलों में चले गए जिसकी वजह से उनका पीछा पुलिस और सेना ने किया | अंत में किसानों को हार माननी पड़ी | मानसा के किसानों ने लगान को कम करने के लिए सत्याग्रह किया | और 3 महीनों के बाद वे अपने लक्ष्य में सफल हुए | मैसूर और चावल 4 राज्यों के किसानों ने सरकार के विरोध आंदोलन चलाया | सैकड़ों किसान मारे गए | थोड़ी बहुत ही सके उनकी माग थी की  उनका  लगान कुछ कम कर दिया जाए |  उड़ीसा की रियासतों में जब किसानों ने विद्रोह किया , तो उनके कुछ शासक राज्य छोड़कर भाग दिया | अंत में उन्हें किसानों को बहुत ही ज्यादा रियायत देनी पड़ी शांति स्थापित होने के बाद उन्होंने अपना रियायत वापस ले ली और विद्रोह फिर भड़क उठे ब्रिटिश राज कालेडीस सेना ने आकर विद्रोह का दमन किया | जिसमे 30,000 से अधिक किसान अपने गांव छोड़ कर चले गए और जंगलों में रहने लगे | बड़ी कठिन अपने गाँव र वापिस आए महाराष्ट्र और कर्नाटक के राज्यों में भी किसानों ने विद्रोह किया और बहुत सी जमींदारों के विरुद्ध सत्याग्रह किया | वे  बहुत सी रियायती लेने में सफल हुए | सारे राजस्थान में किसानों ने कई मास मांसून 1847 में संघर्ष किया और उनको कई प्रकार से करो से मुक्त /छुट्ट मिल |

 दत्त कथा सुंदर ने लिखा है

“ जमीदारी प्रथा और रैयत वाणी प्रथा के साथ-साथ चलने  के कारण , इसकी विशेषताएं एक दूसरे में घुल मिल गई | किंतु तीनों प्रणालियों का झुकाव  जमीदारी प्रथा की प्रवृत्तियों की ओर ही देखने को मिला |”

श्री रमेश दत्त ने लिखा है कि

भू राजस्व का निर्धारण अत्यधिक मात्रा में किया गया और वह अनिश्चित भी था यदि नियमों के अंतर्गत संसार के किसी भी देश को रखा जाए तो किसी की आवृत्ति होती है इन प्रणालियों में किसानों की स्थिति सोच रही हो जाने से कृषि का पतन होने लगा उन्हें न तो सरकारी संरक्षण प्राप्त था और ना ही वे आर्थिक दृष्टि से शब्द के क्षेत्र में नवीन संसाधनों का प्रयोग न करने से देश की कृषि व्यवस्था भी चली गई देश में खाद्यान्न की आवश्यकता की पूर्ति करना ही कठिन हो गया जिसके कारण हमें वर्षों तक खाद्यान्न के आयात पर निर्भर रहना पड़ा वस्तुत इसके लिए ब्रिटिश सरकार की उत्तरदाई थी इलाहाबाद की संधि 1765 से बिहार बंगाल तथा उड़ीसा की दीवानी अंग्रेजों को प्राप्त हो गई कंपनी ने प्रशासन को भारतीय अधिकारियों के हाथों में रहने दिया और इस प्रकार बंगाल में द्वैध शासन स्थापित हुआ वारेन हेस्टिंग द्वारा द्वारा शासन का जमीदारी अधिक बोली लगाने वाले व्यक्तियों के देना शुरू कर दिया अतः जमीदारों ने किसानों से अधिक से अधिक धन वसूलने हेतु उनका शोषण कर दिया है सिंह द्वारा 1777 ईस्वी में चलाई गई वार्षिक व्यवस्था भी कृषकों की स्थिति में कोई सुधार नहीं ला सकी सर जॉन सोरने 1786 श्री में 10 वर्षीय व्यवस्था को लागू किया 1796 बंगाल बिहार उड़ीसा में स्थाई प्रबंध की प्रथा शुरू की गई अब जमीदारी तथा उन्हें तब तक नहीं हटाया जा सका जब तक वे सरकार को निश्चित धनराशि का भुगतान करते रहे थे तथा सरकार से संपर्क नहीं था उनका शोषण होने लगे थे उन्होंने अपने कार्यों पर छोड़ दिया जो किसानों के हित के लिए क्योंकि सरकार के सहयोग में ही पाते थे अब किसानों में तथा उन्होंने किसान सभा नामक संगठन बनाया किसान सभा के हितों की रक्षा के लिए आंदोलन की शुरुआत हुई |

1.2.5.1 संथाल विद्रोह :

पहला आंदोलन संथाल विद्रोह हजारीबाग जिला बीरभूम आदि क्षेत्रों में कार्य करते थे  | जय शांतिप्रिय आदिवासी थे | 1793 ईस्वी के स्थाई भूमि प्रबंध से जमीदारों का इन सीटों पर अधिकार हो गया | जमीदारों द्वारा अत्यधिक लगान मांगने से | यह राजमहल की पहाड़ियों में चले गए और अपने परिश्रम द्वारा वहाँ की भूमि को  कृषि योग्य बनाया | जमीदार इन भूमि पर भी स्वामित्व की मांग करने लगे | साहूकार  भी इनका शोषण  कर रहे थे | तथा पुलिस भी उन्हें बलपूर्वक भूमि से हटा देती थी |  संथाल ने सिंधु तथा कानून बंधुओं के नेतृत्व में विद्रोह किया | जो किसानो के लाभ हेतु कृषि में पूरी लगाकर , किसानों के हितों से कोई लेना-देना नहीं था | उन्होंने किसानों का जमकर आर्थिक शोषण किया | जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था का ढांचा चरमरा लगा | भू राजस्व का निर्धारण अत्यधिक मात्रा में किया गया | और वह अध्यक्ष अनिश्चित भी था | यदि इन नियमों के अंतर्गत संसार के किसी भी देश को रखा जाए ,  तो कृषि की आवृत्ति हो जाएगी | इस प्रणाली में किसानों की स्थिति है | सोचनीय हो जाने के  परिणाम स्वरूप राष्ट्रवाद की उत्पत्ति हुई लोगों में जागरूकता आई और वे अपने अपने अधिकार के लिए आवाज उठाना शुरू कर दिए | लड़ना प्रारंभ कर दिया |  भारतीय राष्ट्रवाद  ने अनेक आंदोलनों को जन्म दिया  | जैसे नील विद्रोह , संथाल विद्रोह , नमक आंदोलन चलाया गया | इन आंदोलनों में महात्मा गांधी की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है  | 

भारत में राष्ट्रवाद की उत्पत्ति- अंग्रेजी शासन काल के अंतर्गत विभिन्न कारणों ने भारतीय जनता में राष्ट्रीय जागृति तथा स्वतंत्रता स्वतंत्र भावना को जन्म दिया | जिसके परिणाम स्वरुप भारत में राष्ट्रीय आंदोलन का उदय हुआ और अंत में 1947 में भारत अपने आपको अंग्रेजी सत्ता के चुंगल से मुक्त करने में सफल हुए |

कोप्लैंड के शब्दों में -

“ भारत का राष्ट्रवाद आंदोलन शक्तियों और कारणों के संजोग का परिणाम था | इस राष्ट्रीय आंदोलन का अध्ययन अट्ठारह सौ पचासी में माना जाता है|  जब भारत में राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई|  लेकिन अंग्रेजों का जन्म कोई आकाश मिक घटना नहीं थी | कांग्रेस की स्थापना , जिसने राष्ट्रीय चेतना के जागरण को एक निश्चित रूप दिया |  जो पर्याप्त समय से भारतीय लोगो को एकत्रित करने का करी किया  , तो यह है कि यह 19वीं शताब्दी राष्ट्रीय नवजागरण काल का ही एक भाग था | इसमें कोई संदेह नहीं कि वह आर्थिक और राजनीतिक असंतोष की अभिव्यक्ति थी  , जो ब्रिटिश शासन के अन्याय के कारण पनप रही थी | इसके साथ ही साथ वह उन राष्ट्रवादी शक्तियों का संश्लेषण थी , जो पहले से ही धार्मिक और सामाजिक सुधार क्षेत्र में सक्रिय थी | भारत के राष्ट्रीय आंदोलन को यूरोप के राष्ट्रीय आंदोलन तथा जापान के उत्कर्ष से भी प्रेरणा मिली थी एवं इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत का राष्ट्रीय आंदोलन की शक्तियों और कारणों के सहयोग का परिणाम था | यहां हम उस में से सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारणों पर विचार करेंगे |”

भारतीय रियासतों मे  किसानों का विद्रोह , भारतीय रियासतों में किसानों की हालत ब्रिटिश इंडिया की तुलना में अधिक खराब थी | उनको कई प्रकार के नाजायज कर और उपकर देने पड़ते थे|  किसानों ने उनके खिलाफ प्रोसेसटेस्ट करना शुरू कार दिया | खेति छोड़कर जंगलों में उनका पीछा पुलिस और सेना ने किया | अंत में किसानों को हार माननी पड़ी | मानसा के किसानों ने लगान को कम करने के लिए सत्याग्रह किया | और 3 महीनों के बाद वे अपने लक्ष्य में सफल रहे | मैसूर और चावल 4 राज्यों के किसानों ने सरकार के विरोध आंदोलन किया | सैकड़ों किसान मारे गए बहुत थोड़ी संख्या में ही लोग बच सके| उनकी मांग थी की  उनका लगा कुछ कम कर दिया जाए | उड़ीसा की रियासतों में जब किसानों ने विद्रोह किया , तो उनके कुछ शासक राज्य छोड़कर भाग गए | अंत में उन्हें किसानों को बहुत ही ज्यादा रियायत देनी पड़ी | शांति स्थापित होने के बाद उन्होंने रियायत को  वापस कर दिया | और विद्रोह फिर भड़क उठे ब्रिटिश राजव्यवस्था के  लेडीस सेना ने आकर विद्रोह का दमन किया | 30,000 से अधिक किसान अपने गांव छोड़ कर चले गए | और जंगलों में रहने लगे बहुत कठिनाई यो का सामने करने के बाद कही वे  सेवर वापिस आ सके | महाराष्ट्र और कर्नाटक के राज्यों में भी किसानों ने विद्रोह किया | और बहुत से  जमींदारों के विरुद्ध सत्याग्रह किया | वे बहुत सी रियायती लेने में सफल हुए | राजस्थान में किसानों ने कई मास के मानसून  1847 में संघर्ष किया | और उनको कई प्रकार से करो से मुक्त देनी पड़ी |

1.2.5.2 तेभागा आंदोलन –

1846  तेभागा आंदोलन उस समय आरंभ हुआ | जब कोलकाता  और  नोवा खली मैं संप्रदायिक दंगे हो रहे थे | यह आंदोलन त्रिपुरा से हसनाबाद से प्रारंभ हुआ | यह जगह नवा खली के समीप था | वहां के बड़ा बटाईदार किसानों ने घोषणा की कि वे फसल का दो तिहाई हिस्सा लेंगे और जमीदारों को केवल एक तिहाई हिस्सा देंगे फसल के विभाजन के कारण यह आंदोलन से तेभाग आंदोलन चलाया हंसना बाद से शुरु होकर यहां आंदोलन संथाल के कई भागों में फैला गया |

निष्कर्ष  -

उपयुक्त विवरणों से यह बात भली भाति स्पष्ट हो जाती है कि ब्रिटिश कालीन कर व्यवस्था अत्यधिक शोषणकारी थी जिसने समाज में दो स्तरीय शोषण को बढ़ावा दिया |प्रथम ब्रिटिश कालीन व्यवस्था ने किसानो का बहुदा शोषण किया इसके अलावा जमीदार के शोषण को अलग बढ़ावा दिया गया |हालाकि ब्रिटिश कालीन कर व्यस्वथा के तहत जमीदारी शक्ति सम्पन्न एवं धनी वर्ग थी किन्तु आकडे जैसा की बताते है उससे यह बात स्पष्ट है कि ब्रिटिश कालीन कर व्यवस्था ने जमीदारी की आर्थिक स्थिति को काफी नुकसान पहुचाया | जिसके पाणीधि राष्ट्रवाद के रूप में हुई अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध जगह जगह पर विरोध होने लगे अंतत : अंग्रेजी सत्ता को अपने नीतियों में परिवर्तन करते हुए उनमे बदलाव लाना पड़ा | रियायते देनी पड़ गई |    

संदर्भ  -

1. दत्त रमेश , : द एकॉमोिनक हिस्ट्री  ऑफ़ इंडिया 

2. पी एन चोपड़ा,बी एन पूरी ,एम एन दास : आधुिनक भारत का सामािजक ,सांस्कृतिक एवं आर्थिक इतिहास  | 

3.ओम प्रसाद  : समािजक एवं आर्थिक इतिहास 

4.भारत में ब्रिट्रिश  शासको का आर्थिक नीति  एवं उसका पराभव  (कार्नवालिस का  भ-ू राजस्व  एवं रैयतवाणी     व्यवस्था ) http://www.iasplanner.com/civilservices/hindi/ias-pre/gshistory/modern-indian-history-british-land-revenue-system-in-india-ryotwari-system

5.भारत में अंग्रजो की भू राजस्व की नीतियाँ   
http://www.vivacepanorama.com/indian-land-revenue-policies-in-british-rule/

6. ब्रिटिश भारत में  जमीदार ,रैयतवाणी और महालवाणी व्यवस्थाएं 
https://www.rajasthanhistory.com/blog/modern-history-of-india/jamindari-rayatwadi-andmahalwadi-managements-in-british-india).  

लेखिका - पूनम खरवार 

सह - लेखक - शिव कुमार खरवार 


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