Art in Hindi ( कला )

Art in Hindi ( कला )

"कला  ईश्वर से जुड़ने का सबसे सीधा और सरल मार्ग है"

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 Art in Hindi


कला की परिभाषा (Definition of Art in Hindi)


आप सभी को नमस्कार,यह लेख सम्पूर्ण रूप से कला को समर्पित है जिसमे आज हम नटराज की देन कला से अर्जित ज्ञान की चर्चा करेंगे | वास्तव में कला की परिभाषा दे पाना किसी के लिए भी आसान नहीं क्यूंकि कही न कही यह हमारे भीतर से आती है कला की परिभाषा देना  आसान  नहीं है किन्तु  कुछ विद्वानों कि माने तो यु कहे कि कला की व्यापकता इतनी है इसे किसी सांचे में नही डाला जा सकता है . कला अपने आप में अनेक विविधताओं को समाए हुए ,स्वयं में कला को परिभाषित करने वाले विभिन्न विद्वानों के मतो में भी भेद अथवा यु कहे कि कला की परिभाषा में मतभेद देखने को मिलता है | 

यही वजह है कला की कोई एक सर्व मान्य परिभाषा का अभाव देखने को मिलता है फिर विभिन्न विद्वानों ने इसे अपने अपने तरह से परिभाषित करने का कार्य किया है | भारतीय कला एवं संस्कृति ने कला का कौशल के रूप में परिभाषित करने का कार्य किया है कुछ परिभाषाओं इस प्रकार यह है  - 

परिभाषा   -

भारतीय संस्कृति  एवं सभ्यता के अनुसार  -  

भारतीय साहित्य में कला को क्रियाओं के करने के कौशल के रूप में परिभाषित किया गया , इनका मान्यता के अनुसार  व्यक्ति द्वारा किये जाने वाले वो तमाम कार्य कला की श्रेणी में आते है क्योकि  व्यक्ति  द्वारा किये जाने वाले तमाम कार्य में कौशल की जरुरत होती है | इसी कौशल को भारतीय संस्कृति में कला का नाम दिया गया | 

कला को भारतीय संस्कृति में योग साधना के रूप देखा गया है , कला के बारे धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि कला विचार के एक दृश्य रूप मात्रा माना गया जिसमे हमारी कल्पनाएँ , आदर्श , सर्जन शक्ति समाहित होती है | यह सर्जनात्मक शक्ति की वजह भावनाओं , संवेदनाओं ,विचार पद्धति  होती है |

मार्क रोथोको के अनुसार  -  

मार्क रोथको एक अमेरिकन कलाकार है , इन्होने कला के रूप पर बोलते हुए यह कहा कि कला अमूर्त है , अर्थात् जो दिखने योग्य न हो ,उनके कहने का सीधा सा मतलब यह था कि कला को किस सांचे में नही ढाला जा सकता क्योकि का कोई रूप ही नही है , कला एक जल समान जिसमे आयतन के बर्तन में डाल दो वो उसी का रूप ले लेगा , क्योकि कला रंग , रूप , से परे है , कला का सम्बन्ध भावनाओं से है , ये तो कयामत , त्रासदी , परमानन्द का नाम है , यह भावो के अभिव्यक्ति का नाम है | 

एक अन्य मान्यता के अनुसार  - 

इस मान्यता का यह मानना है मानवीय क्रियाकलापों अथवा गतिविधियों के मुख्य तीन तीन स्त्रोत देखने को मिलते है जिनमे  श्रवण  अर्थात् सुनकर  , दृश्य अर्थात् देखकर  ,महसूस अर्थात् छूकर अथवा महसूस शामिल है | जिनको ज्ञानेद्रियो पर आधार ज्ञान भी कहते है | वास्तव में ज्ञान का यही यही स्त्रोत भी है , हम इन्ही ज्ञानेन्द्रियो के माध्यम से ही ज्ञान अर्जित करते है | इन्ही से हमारे अंदर कल्पनाओ का विकास होना , विचारो का पनपना एवं मानव के अंदर कौशल का विकाश होना भी इन्ही पर निर्भर करता है  और  इन्ही की अभिव्यक्ति कला  के रूप में प्रतिबिम्बित होती है . कला यही ज्ञानेन्द्रियो के सुंदर एवं भावनात्मक प्रस्तुतीकरण का नाम है |

एक अन्य मान्यता के अनुसार  -  

इस मान्यता का यह मानना है कि व्यक्ति के द्वारा किये जाने वाले कार्य वे कार्य जिनमे  व्यक्ति की  मन के भावनाओं का प्रदर्शित होती है अथवा  यह कह सकते है कि व्यक्ति के आंतरिक भावनाओं का अथवा विचारो का  प्रस्तुतीकरण ही  कला है |

एक अन्य मान्यता के अनुसार  -

इस मान्यता  की माने तो कला व्यक्ति के अंतर भावनाओं अथवा हमारे भीतर/ अंदर निहित हुनर जिसे इंग्लिश में स्किल कहते है  , प्रदर्शित रूप है अथवा यह कह सकते है कि  कला हमारे भीतर की हुनर तथा प्रतिभा को प्रस्तुतीकरण है  |

हिंदी खोज डिक्शनरी के अनुसार  - 

 हिंदी खोज डिक्शनरी की माने तो कला  मानव के  रचनात्मक कौशल  का  एवं  उनकी  कल्पनाओं  की अभिव्यक्ति अथवा अनुप्रयोग का नाम है .

कला के क्षेत्र में प्रयोग किये जाने वाले शब्द  - 

  1. कलाकाल/ चित्रकार   -  कलाकार/ चित्रकार  कला की भाषा में अ=उनको कहा गया जिन्होंने अपने हुनर को पेन/पेन्सिल ,अथवा अन्य उपकरणों के माध्यम से एक कागज पर उतरा हो .
  2. आर्टि                     -   कला  की भाषा में आर्टि   को  नकली कलाकार के  रूप में परिभाषित किया है |इसका अर्थ यह है कि वे व्यक्ति जिन्हें कला का ज्ञान नही होता किन्तु वो कला का नकाब पहनकर दुनियां को मुर्ख बनाते है , उन्हें आर्टि  के रूप में जाना जाता है . 

कला के प्रकार   - 

प्राचीन धर्म ग्रंथो में कला की कुल 64 विधाएँ बताई गई है  जिसको चार  श्रेणियों में विभाजित किया गया है - 

  1. कर्माश्रित 
  2. छुताशित 
  3. शयनो उपाचारिका 
  4. उत्तर कला  

ज्ञानेद्रियो पर आधारित कलाएं  - 


1 . स्थित कला 
2 . गतिशील कला 
3 . सहज कला 
4 . माध्यम कला 
5 .दृश्य कला 

 मांसपेशियों के आधार पर कला  के रूप  - 


1. श्रवण कला सामान्य तौर पर दो प्रकार की देखि गई है , जिनके विविध रूप है जो निम्नवत है  - 
 
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कला के प्रकार   

2.निम्न कलाएँ 
3. उच्च कलाएँ 

कला की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि  - 

वैसे तो कला का विकास  मानवीय सभ्यता के विकास के ही समय हो गया था जब मनुष्यों ने अपने  सुख एवं दुःख को एक दुसरे के साझा करना शुरू किया कालान्तर  यही कला के नाम से जानी गई ,  समय के साथ इसके रूप में भी परिर्वतन देखने को मिले वर्तमान समय में संगीत , कविता , नाट्य , अभिनय , प्रस्तुतिकरण , वादन , के रूप में कला हमारे सामने उभर कर आई |   

सम्भवतः सर्वप्रथम  कला शब्द का प्रयोग भारत के नाट्यकला में प्रतिबिम्बित होता है , प्राचीन भारत के  प्रसिद्ध वात्सायन एवं उशनस के कृति में इसकी झलक देखने को मिलता है , अलावा जैन के धर्म ग्रंथो में भी इसकी झलक स्पष्ट रप में प्रदर्शित होती है  - 

कला के विविध रूप उदाहनार्थ    - 

मन के अंदर की दुनिया का प्रस्तुतीकरण कला कहलाता है अत: किसी प्रकार की रचना करने कि क्रिया को  कला कहते है  दोस्तों यही नहीं कला इस संसार में विभिन्न रूपों में, विभिन्न माध्यमों से  प्रकट होती है उदाहरण स्वरूप 

(1) किसी  प्रेमी का किसी प्रेमिका के सामने अपने प्रेम भाव को प्रकट करना |

(2) किसी वक्ता के द्वारा अपनी भावनाओं का भाषा के माध्यम से प्रस्तुतीकरण करना इसे भाषा कला कहते हैं |

(3) किसी गूंगे के द्वारा अपने भाव को किसी के सामने अपने अंगों का उपयोग करके इशारों के माध्यम से प्रकट           करना भी एक कला है |


(4) किसी कवि के द्वारा कविता के माध्यम से अपने अंदर कि भावनाओ को व्यक्त करना भी एक कला है |


(५) किसी संगीतकार के द्वारा किसी संगीत के माध्यम से अपने अंदर की भावनाओ को प्रकट करना भी एक कला        है |

कला की विशेषताएँ  मुख्यतः वात्सल्य कला के क्षेत्र  में   - 

1. संगीत की प्रधानता  
2. काव्य की प्रधानता  
3.मूर्ति  की प्रधानता  
4. स्थापत्य की प्रधानता  
5. चित्र शैली की प्रधानता  

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